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ألا
إنَّ
ليلـى
بالعـراق
مريضـة |
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وأنت
خلي
البـال
تلهو
وترقـد |
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فلو
كنت
يا
مجنون
تضنى
من
الهوى |
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لبـت
كما
بات
السليم
المسهـد |
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يقـولون
ليلى
بالعـراق
مريضـة |
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فما
لك
لا
تضنـى
وأنت
صديـق |
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شفى
الله
مرضى
بالعـراق
فأننـي |
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على
كل
مرضى
بالعراق
شفيـق |
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فإن
تك
ليلى
بالعـراق
مريضـة |
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فإني
في
بـحر
الحتـوف
غريـق |
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أهيـم
بأقطار
البلاد
وعرضهـا |
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ومالـي
إلى
ليلى
الغـداة
طريـق |
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كـأن
فـؤادي
فيه
مور
بقـادح |
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وفيه
لـهيب
ساطـع
وبـروق |
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إذا
ذكرتها
النفس
ماتت
صبابـة |
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لهـا
زفـرة
قتـالة
وشهيــق |
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سقتنـي
شمس
يخجل
البدر
نورها |
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ويكسف
ضوء
البرق
وهو
بـروق |
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غرابية
الفرعيـن
بدريـة
السنـا |
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ومنظـرها
بادي
الجمـال
أنيـق |
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وقد
صرت
مجنونا
من
الحب
هائما |
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كأنـي
عان
في
القيـود
وثيـق |
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أظل
رزيح
العقل
ما
أطعم
الكرى |
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وللقلـب
منـي
أنـة
وخفـوق |
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برى
حبها
جسمي
وقلبي
ومهجتي |
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فلم
يبـق
إلاّ
أعظـم
وعـروق |
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فلا
تعذلوني
إن
هلكت
ترحـموا |
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علي
ففقـد
الروح
ليس
يعـوق |
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وخطوا
على
قبري
إذا
مت
واكتبوا |
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قتيل
لـحاظ
مات
وهو
عشيـق |
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إلى
الله
أشكو
ما
ألاقي
من
الهوى |
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بليلى
ففي
قلبي
جوى
وحريـق |