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يـا
جـارة
الـوادي
طربـت
وعادنـي |
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مـا
يشبـه
الأحـلام
مـن
ذكــراك |
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مثَّلت
في
الذكرى
هـواك
وفي
الكـرى |
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والذكريـات
صـدى
السنيـن
الحاكـي |
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ولقـد
مررت
علـى
الريـاض
بربـوة |
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غنّـاء
كنــت
حيـالــها
القـــاك |
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ضحكـت
إلـى
وجوهـها
وعيـونـها |
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ووجـدت
فـي
أنفـاســها
ريّــاك |
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فذهبـت
فـي
الأيـام
أذكـر
رفرفـاً |
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بيـن
الجـداول
والعيــون
حــواك |
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أذكـرت
هرولـة
الصبابـة
والهـوى |
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لمـا
خطــرت
يُقَبِّــلان
خُطَــاكِ |
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لم
أدر
ما
طيب
العنـاق
علـى
الهـوى |
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حتـى
تـرفّـق
سـاعـدي
فَطَــواك |
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وتَـأَوَّدتْ
أَعطـافُ
بأنَّـك
فـي
يـدي |
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واحمَــرَّ
مـن
خَفـرَيهِـما
خــدَّاك |
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ودخلـت
في
ليليـن
فرعـك
والدجـى |
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ولثمـت
كـالصبـح
المنـور
فــاك |
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ووجـدتُ
في
كُنـهِ
الجوانـح
نَشـوَةً |
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من
طيـب
فيـك
ومن
سُـلافِ
لَمَـاكِ |
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وتعطلـت
لغـة
الكـلام
وخـاطبـت |
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عَينـيَّ
فـي
لُغـة
الهـوى
عَينــاك |
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ومحـوت
كـل
لبانـة
مـن
خاطـري |
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ونسيـت
كـل
تعــاتـب
وتشــاك |
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لا
أمس
من
عمـر
الزمـان
ولا
غـد |
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جُمـع
الزمـان
فكـان
يـوم
رضـاك |