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روعـوه
فتـولـى
مغضبــا |
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أعلمتـم
كيف
ترتـاع
الظبـا |
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خلقـت
لاهيـة
نـاعـمـة |
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ربـما
روعهـا
مـر
الصبــا |
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لـي
حبيـب
كلمـا
قيل
لـه |
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صدق
القـول
وزكـى
الريبـا |
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كـذب
العـذال
فيما
زعمـوا |
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أملـي
في
فاتنـي
مـا
كذبـا |
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لـو
رأونـا
والـهوى
ثالثنـا |
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والدجى
يرخي
علينـا
الحجبـا |
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فـي
جـوار
الليـل
في
ذمتـه |
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نذكـر
الصبـح
بأن
لا
يقربـا |
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ملء
بردينـا
عفـاف
وهـوى |
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حفظ
الحسـن
وصنـت
الأدبـا |
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يـا
غـزالا
أهـل
القلـب
بـه |
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قلبـي
السفـح
وأحنـى
ملعبـا |
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لك
مـا
أحببـت
مـن
حبتـه |
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منهـلا
عذبـا
ومرعـى
طيبـا |
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هو
عنـد
المـالك
الأولـى
بـه |
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كيـف
أشكـو
أنه
قـد
سلبـا |
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إن
رأى
أبقـى
على
مـملوكـه |
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أو
رأى
أتـلفـه
واحتسبـــا |
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لـك
قـد
سجـد
البـان
لـه |
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وتـمنت
لـو
أقلتـه
الـربـى |
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ولحـاظ
مـن
معانـي
سحـره |
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جـمع
الجفـن
سهـاما
وظبـى |
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كـان
عن
هـذا
لقلبـي
غنيـة |
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ما
لقلبـي
والـهوى
بعد
الصبـا |
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فطرتـي
لا
آخـذ
القلـب
بـها |
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خلـق
الشـاعر
سـمحا
طربـا |
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لو
جلـوا
حسنك
أو
غنـوا
بـه |
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للبيـد
فـي
الثمـانيـن
صبـا |
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أيهـا
النفـس
تـجدين
سـدى |
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هـل
رأيـت
العيـش
إلاّ
لعبـا |
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جربـي
الدنيا
تهـن
عنـدك
مـا |
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أهـون
الدنيـا
علـى
من
جربـا |
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نلـت
فيما
نلـت
من
مظهرهـا |
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ومنحـت
الـخلد
ذكـرا
ونبـا |