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وحقـك
أنـت
المنـى
والطلـب |
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وأنـت
الـمـراد
وأنـت
الأرب |
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ولي
فيـك
يـا
هاجـري
صبـوة |
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تحيـر
فـي
وصفـها
كل
صـب |
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أبيـت
أسـامـر
نجـم
الســما |
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إذا
لاح
فـي
الـدجـى
أو
غـرب |
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أمـولاي
بالله
رفـقـا
بـمــن |
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إليـك
بـذل
الغـرام
انـتسـب |
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ويـا
هاجـري
بعـد
ذاك
الرضـا |
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بحقـك
قـل
لـي
لهـذا
سبـب |
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فإنـي
حـسيبـك
مـن
ذا
الجـفا |
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ويا
سيـدي
أنـت
أهـل
الحسـب |
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متـى
يـا
جـميل
المـحيـا
أرى |
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رضـاك
ويذهـب
هذا
الغضـب |
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فإنـي
محـب
كمـا
قد
عهـدت |
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ولكن
حبـك
شـيء
عـجـب |
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ومثـلك
مـا
يـنبغـي
أن
يصـد |
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ويهجـر
صبـا
لـه
قـد
أحـب |
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أشاهـد
فيـك
الجمـال
البـديع |
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فيـأخذنـي
عنـد
ذاك
الطـرب |
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ويعجبنـي
منك
حسـن
القـوام |
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وليـن
الـكـلام
وفـرط
الأدب |
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وحسبـك
أنـك
أنـت
المليـح |
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الكـريم
الجـدود
العريق
النسـب |
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أمـا
والـذي
زان
منـك
الجبيـن |
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وأودع
فـي
اللحـظ
بنت
العنـب |
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وأنبـت
في
الخـد
روض
الجـمال |
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ولكـن
سـقاه
بـمـاء
اللهـب |
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لإن
جدت
أو
حرت
أنت
الـمراد |
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ومـالي
سـواك
مليـح
يـحب |