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يـا
مـن
هـواه
أعــزه
وأذلنــي |
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كيـف
السبيـل
إلى
وصـالك
دلنـي |
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تـركتنـي
حيـران
صبّـا
هـائمـا |
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أرعى
النجـوم
وأنت
في
نـوم
هنـي |
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عاهـدتنـي
ألاَّ
تميـل
عـن
الهـوى |
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وحلفـت
لـي
يـا
غصـن
ألا
تنثنـي |
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هـبّ
النسيـم
ومـال
غصـن
مثلـه |
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أيـن
الزمـان
وأيـن
مـا
عاهدتنـي |
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جـاد
الزمـان
وأنـت
ما
واصلتنـي |
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يا
باخـلاً
بالـوصـل
أنـت
قتلتنـي |
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واصلتنـي
حتـى
ملكـت
حشاشتـي |
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و
رجعت
من
بعد
الوصـال
هجرتنـي |
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لمـا
ملكـت
قيـاد
سـري
بالهــوى |
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وعلمـت
أنـي
عـاشـق
لك
خنتنـي |
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و
لأقعـدن
علـى
الطريـق
فأشتكـي |
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فـي
زي
مظلـوم
وأنـت
ظلمتنــي |
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ولأشكينـك
عنـد
سلطـان
الهــوى |
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ليعـذبنـك
مثــل
مـا
عـذبتنــي |
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ولأدعيـن
عليـك
في
جنـح
الدجـى |
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فعسـاك
تبلـى
مثـل
مـا
أبليتنــي |