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كـم
بعثنـا
مع
النسيـم
سـلاما |
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للحبيـب
الجـميل
حيـث
أقـاما |
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وسـمعنا
للطيور
في
الروض
تشـدو |
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فنقلنـا
عـن
الـطيـور
كـلاما |
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نحـن
قـوم
مخلـدون
وإن
كنـا |
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خلقنـا
لكـي
نـمـوت
غـراما |
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وإذا
نـامـت
العيـون
فهـذي |
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يـا
حبيبتـي
قلوبنـا
لـن
تنـاما |
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خافقـات
تـدق
من
ألم
الوجـد |
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نـشـيـدا
فـتحسـن
الأنغـاما |
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قـد
قنعنـا
بـحبـه
ورضينـا |
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لـو
بقـى
سـاعة
ويهجـر
عـاما |
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ولكم
زار
فـي
الكرى
فـوددنا |
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لـو
قضينـا
هـذه
الحيـاة
نيـاما |
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فرقت
قلبنـا
العيـون
اللـواتي |
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نـمن
من
صحـة
الجـمال
سقـاما |
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فكـأن
القلـوب
كانت
لـواء |
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وكـأن
العـيـون
كانـت
سـهاما |
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ما
شربت
المـدام
إلا
لأنسـى |
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يـا
أحبــائـي
هــذه
الآلامـا |