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ألا
ليت
ريعان
الشبـاب
جديـد |
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ودهـرا
تولـى
يا
بثيـن
يعـود |
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فنبقـى
كما
كنا
نكـون
وأنتـم |
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قـريب
وإذ
ما
تبذليـن
زهيـد |
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وما
انس
من
الأشياء
لا
أنس
قولها |
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وقـد
قربت
نضوي
أمصر
تريـد |
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ولا
قولـها
لولا
العيون
التي
تـرى |
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لزرتك
فاعذرنـي
فدتك
جـدود |
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خليلي
ما
ألقى
من
الوجد
باطـن |
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ودمعي
بـما
أخفي
الغداة
شهيـد |
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ألا
قـد
أرى
والله
أن
رب
عبـرة |
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إذا
الـدار
شطت
بيننـا
ستزيـد |
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إذا
قلت
ما
بـي
يا
بثينة
قاتلـي |
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من
الـحب
قالت
ثابـت
ويزيـد |
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وإن
قلت
ردي
بعض
عقلي
أعش
به |
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تولـت
وقالـت
ذاك
منك
بعيـد |
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فلا
أنا
مردود
بـما
جئت
طالبـا |
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ولا
حبهـا
فيمـا
يبيـد
يبيــد |
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جزتك
الجـوازي
يا
بثين
سلامـة |
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إذا
ما
خليـل
بان
وهـو
حـميد |
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وقلت
لـها
بيني
وبينك
فاعلمـي |
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مـن
الله
ميثـاق
لـه
وعهــود |
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وقـد
كان
حبيكم
طريفا
وتالـدا |
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وما
الـحب
إلاّ
طـارف
وتليـد |
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وإن
عروض
الوصل
بينـي
وبينها |
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وإن
سهلتـه
بالـمنى
لكــؤود |
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وأفنيت
عمري
بانتظاري
وعدهـا |
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وأبليـت
فيها
الدهر
وهو
جديـد |
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فليـت
وشاة
الناس
بيني
وبينهـا |
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يدوف
لهم
سـما
طماطم
سـود |
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وليتهم
في
كل
مـمسى
وشـارق |
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تضـاعف
أكبـال
لهم
وقيـود |
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ويحسب
نسوان
من
الجهل
أننـي |
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إذا
جئـت
إيّاهُن
كنـت
أريـد |
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فأقسـم
طرفي
بينهن
فيستـوي |
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وفـي
الصـدر
بون
بينهن
بعيـد |
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ألا
ليـت
شعري
هل
أبيتن
ليلـة |
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بـوادي
القرى
إنـي
إذن
لسعيـد |
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وهل
أهبطن
أرضا
تظل
رياحهـا |
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لـها
بالثنـايا
القاويات
وئيـد |
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وهل
ألقين
سعدى
من
الدهر
مرة |
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وما
رث
من
حبل
الصفاء
جديد |
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وقد
تلتقي
الأشتات
بعد
تفـرق |
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وقد
تدرك
الحاجات
وهي
بعيد |
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وهل
أزجرن
حرفا
علاة
شملـة |
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بـخرق
تباريها
سواهم
قـود |
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على
ظهر
مرهوب
كأن
نشوزه |
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إذا
جـاز
هلاك
الطريق
رقـود |
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سبتني
بعيني
جؤذر
وسط
ربـرب |
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وصدر
كفاثور
اللجين
وجيـد |
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تزيف
كما
زافت
إلى
سلفاتـها |
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مبـاهية
طي
الوشـاح
ميـود |
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إذا
جئتها
يوما
من
الدهر
زائـرا |
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تعرض
منفوض
اليدين
صـدود |
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يصد
ويغضي
عن
هواي
ويجتني |
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ذنوبـا
عليهـا
إنـه
لعنـود |
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فأصرمها
خوفا
كأني
مـجانب |
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ويغفـل
عنـا
مـرة
فنعـود |
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ومن
يعط
في
الدنيا
قرينا
كمثلها |
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فذلك
في
عيـش
الحياة
رشيـد |
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يـموت
الهوى
مني
إذا
ما
لقيتها |
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ويـحيا
إذا
فارقتهـا
فيعـود |
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يقولون
جاهد
يا
جـميل
بغزوة |
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وأي
جهـاد
غيـرهن
أريـد |
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لكـل
حديث
بينهـن
بشاشـة |
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وكـل
قتيل
عنـدهن
شهيـد |
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وأحسن
أيامي
وأبـهج
عيشتـي |
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إذا
هيـج
بي
يوما
وهن
قعـود |
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تذكرت
ليلى
فالفـؤاد
عميـد |
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وشطت
نواها
فالـمزار
بعيـد |
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علقت
الهوى
منها
وليدا
فلم
يزل |
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إلـى
اليوم
ينمي
حبها
ويزيـد |
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فما
ذكـر
الخلان
إلاّ
ذكرتـها |
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ولا
البخل
الا
قلت
سوف
تـجود |
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إذا
فكرت
قالت
قد
أدركت
وده |
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وما
ضرنـي
بخلي
فكيف
أجـود |
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فلو
تكشف
الأحشاء
صودف
تحتها |
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لبثنـة
حـب
طـارف
وتليـد |
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ألم
تعلمي
يا
أم
ذي
الودع
أننـي |
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أضاحك
ذكراكم
وأنت
صلـود |
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فهل
ألقيـن
فـردا
بثينـة
ليلـة |
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تـجود
لنـا
من
ودها
ونـجود |
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ومن
كان
في
حبي
بثينة
يـمتري |
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فبـرقاء
ذي
ضال
علي
شهيـد |