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هَبُـوا
لي
على
الشـوق
قلبـا
جليـدا |
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وأنـهـوا
خـيـالـكـم
أن
يـعـودا |
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فـقـد
هـاج
لـي
شجـنـا
سـاكنـا |
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وذكـر
عـهـدا
تـولّـى
حمـيــدا |
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ومـا
أشتكـي
مـن
غـرامـي
بكـم |
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كفـى
بـالنحـول
عليـه
شـهـيـدا |
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ولـي
بعـدكـم
خَـطَـراتُ
تـنـمُّ |
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بـهـا
زَفَـراتُ
تُـذيـبُ
الحـديـدا |
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وعـيـن
جـفـا
الـنـوم
أجفـانـها |
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ولـم
يجـد
السُّـهـدُ
عنـها
محيـدا |
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كـأن
كـراهـا
كــرى
حـائــم |
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إذا
هــمَّ
أن
يـرد
الـدمـع
ذيــدا |
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فـيـا
عــاذلا
رام
بــي
سـلـوة |
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رميـت
بعـذلـك
مـرمـى
بعـيـدا |
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فـعـذلـك
لـسـت
أرى
مـخـلـدا |
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إليـه
و
لـو
كنـت
أعطـى
الخلـودا |
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ومـا
هـو
إلاَّ
كبـعـض
الـريـاح |
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تـزيـد
بـه
نـار
شـوقـي
وقـودا |
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أأسلُـو
حَـبـيـبـاً
أرى
سخـطـه |
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رضـى
وفنـائـي
عليـه
وجــودا |
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وأظـمـا
إلـيــه
وإن
لـــم
أزل |
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أُحَــلاَّ
بـهـا
مـا
أردت
الـورودا |