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ليت
الذي
خلق
العيـون
السـودا |
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خلـق
القلوب
الخافقات
حديـدا |
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لـولا
نواعسـها
و
لولا
سحـرها |
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مـا
ود
مـالك
قلبـه
لو
صيـدا |
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إن
أنت
أبصرت
الجمال
و لم
تـهم |
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كنت
امرءا
خشن
الطبـاع
بليـدا |
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وإذا
طلبـت
مع
الصبـابة
لـذة |
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فلقـد
طلبت
الضـائع
الموجـودا |
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يا
ويـح
قلبـي
إنـه
في
جانبـي |
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وأظنـه
نـائـي
المـزار
بعيـدا |
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هي
نظرة
عرضت
فصارت
في
الحشا |
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نارا
وصار
لـها
الفـؤاد
وقـودا |
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والحـب
صـوت
فهو
أنه
نائـح |
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طـورا
وآونـة
يكـون
نشيـدا |
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ويلـذ
نفسي
أن
تكـون
شقيـة |
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ويلـذ
قلبـي
أن
يكون
عميـدا |
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إن
كنـت
تدري
ما
الغرام
فداوني |
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أو
لا
فخـل
العـذل
و
التفنيـدا |
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ما
شـمت
حسنك
قط
إلا
راعني |
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فوددت
لو
رزق
الجمال
خلـودا |
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وإذا
ذكرتك
هز
ذكرك
أضلعـي |
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شـوقا
كما
هز
النسـيم
بنـودا |
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و
لقد
يكون
لي
السلـو
عن
الهوى |
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لكنـما
خـلـق
المـحب
ودودا |